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रक्षा बंधन और बहनों की सुरक्षा ; वचन से आगे, हकीकत में सुरक्षा कब?

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रक्षा बंधन — वचन से आगे, हकीकत में सुरक्षा कब?

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देशभर में राखियों के रंग, मिठाइयों की खुशबू और भाई-बहन के रिश्तों की मिठास बिखरी है। कलाई पर बंधा धागा भाई को अपनी बहन की सुरक्षा का संकल्प याद दिलाता है। लेकिन आइना सच दिखाता है—जहां एक तरफ भाई ‘जान तक देने’ का वादा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ देश की बहनों की सुरक्षा आज भी अधर में लटकी है।

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कहां है वह सुरक्षा, जब रोज़ाना अखबार के पन्नों पर छेड़छाड़, दुष्कर्म, दहेज हत्या और महिला उत्पीड़न की खबरें जगह घेरती हैं? आंकड़े चीख-चीखकर बता रहे हैं कि बहनों की असुरक्षा का ग्राफ घटने के बजाय बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—क्या राखी का धागा सिर्फ एक दिन का भावनात्मक प्रतीक है, या सालभर निभाई जाने वाली जिम्मेदारी?

समस्या कानून की किताब में नहीं, बल्कि समाज की सोच में है। जब तक बहनों को ‘संरक्षण’ देने के बजाय ‘सम्मान’ देने की मानसिकता नहीं बनेगी, तब तक ये पर्व सिर्फ औपचारिकताएं बनकर रह जाएंगे। भाई को केवल अपनी बहन ही नहीं, पड़ोस की, गांव की, और समाज की हर महिला की इज्जत और सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी माननी होगी।

अब वक्त है कि हम रक्षा बंधन को सिर्फ तिलक और मिठाई तक सीमित न रखें। इस धागे की असली ताकत तभी साबित होगी, जब बहनों के खिलाफ एक भी अन्याय बर्दाश्त न हो। वचन से आगे बढ़कर हकीकत में सुरक्षा की गारंटी दें—तभी इस पर्व का मकसद पूरा होगा, और तब सचमुच कह सकेंगे—“मेरी बहन सुरक्षित है।”

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