
रायगढ़ में अफीम खेती पर कार्रवाई, पर जिम्मेदार अधिकारियों पर सवाल क्यों नहीं?

रायगढ़ जिले में इन दिनों पुलिस प्रशासन द्वारा अवैध अफीम की खेती के खिलाफ लगातार सख्त कार्रवाई की जा रही है। अलग-अलग क्षेत्रों में छापेमारी कर अफीम की फसलों को नष्ट किया जा रहा है और संबंधित लोगों पर कानूनी कार्यवाही भी की जा रही है। पुलिस की इस सक्रियता से यह साफ है कि जिले में नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ अभियान तेज हुआ है।
लेकिन इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है—आखिर जिम्मेदार विभागों, खासकर राजस्व विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
दरअसल, शासन द्वारा लागू डिजिटल क्रॉप सर्वे (फसल सर्वेक्षण) की प्रक्रिया का उद्देश्य ही यही है कि खेतों में बोई जाने वाली फसलों का सही और समय पर रिकॉर्ड तैयार किया जा सके। यह सर्वे जमीनी स्तर पर, मौके पर जाकर किया जाता है, ताकि किसी भी प्रकार की अवैध खेती को शुरुआती चरण में ही चिन्हित किया जा सके।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब डिजिटल सर्वे की व्यवस्था मौजूद है, तो फिर बड़े पैमाने पर अफीम की खेती कैसे हो गई? क्या सर्वेक्षण केवल कागजों में पूरा किया गया? या फिर जिम्मेदार कर्मचारियों ने अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही बरती?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोरों पर है कि कई राजस्व कर्मचारी मुख्यालय में उपस्थित रहकर काम करने के बजाय दूर से ही औपचारिकताएं पूरी कर रहे हैं। यदि वास्तव में मौके पर जाकर सर्वे किया गया होता, तो अवैध अफीम की खेती समय रहते पकड़ में आ सकती थी।
यह भी माना जा रहा है कि राजस्व विभाग की इसी लापरवाही का परिणाम है कि जिले के कई इलाकों में अफीम की अवैध खेती पनपती रही। अब जब पुलिस कार्रवाई कर रही है, तो केवल किसानों या आरोपियों पर ही कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा रही, बल्कि उन अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होना जरूरी है जिनकी निगरानी में यह सब हुआ।
जनता के बीच यह मांग उठ रही है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि कहीं लापरवाही या मिलीभगत पाई जाती है, तो संबंधित राजस्व अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी सख्त कार्रवाई की जाए।
यदि प्रशासन वास्तव में नशामुक्त समाज की दिशा में गंभीर है, तो उसे केवल कार्रवाई तक सीमित न रहकर जवाबदेही भी तय करनी होगी, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।