छत्तीसगढ़रायगढ़

अदालतों में बढ़ते मामले : ठप्प पड़ी ग्रामीण न्याय व्यवस्था

WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.05
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.06 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.06
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.16
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.07
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.08
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.07 (1)

अदालतों में बढ़ते मामले : ठप्प पड़ी ग्रामीण न्याय व्यवस्था

WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.15
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.14 (2)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.14
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.15 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.14 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.13
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.12

देश की अदालतें आज मामलों के बोझ तले दबी हुई हैं। लाखों मुकदमे वर्षों से लंबित हैं और न्याय की राह देखने वाले लोगों की उम्मीदें धीरे-धीरे टूट रही हैं। कहा जाता है – न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के बराबर है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि भारत के गांवों में छोटी-छोटी बातों पर भी लोग अदालतों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.11 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.09 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.11
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.10
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.12 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.09
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.08 (1)

ठप्प पड़ी ग्रामीण न्याय व्यवस्था

ग्रामीण भारत में कभी चौपालें और पंचायतें आपसी विवाद सुलझाने का सबसे मजबूत मंच हुआ करती थीं। दो परिवारों के बीच ज़मीन की सीमा का विवाद हो, खेत के पानी बंटवारे की बात हो या घरेलू कलह—गांव के बुजुर्ग और पंच इसका हल निकाल देते थे। निर्णय त्वरित होता था, खर्चा शून्य और समाधान टिकाऊ। मगर आज वह परंपरा खोखली पड़ गई है। पंचायतें राजनीति का अखाड़ा बन गईं और गांवों की न्याय व्यवस्था पूरी तरह ठप्प। नतीजा यह है कि लोग सीधे अदालतों की शरण में जा रहे हैं, जहां वर्षों तक फैसला नहीं मिल पाता।

न्याय महंगा और थकाऊ

अदालतों का हाल यह है कि छोटी-सी जमीन की खूँटी के विवाद को सुलझाने में भी 10-10 साल लग जाते हैं। ग्रामीण जनता के पास न इतना पैसा है कि वकीलों की भारी फीस चुका सके और न इतना समय कि रोज़-रोज़ शहर जाकर तारीख पर हाज़िरी लगाए। निचली अदालतों की धीमी गति और ऊपरी अदालतों का अंबार—यह पूरा तंत्र आम आदमी के लिए न्याय की बजाय बोझ बन गया है।

सवाल उठता है—क्या यही लोकतंत्र की बुनियाद है?

जब संविधान ने नागरिकों को सस्ता और सुलभ न्याय देने का वादा किया था, तो फिर ग्रामीण जनता क्यों ठगी जाए? क्यों पंचायत स्तर पर बने ग्राम न्यायालय अधिनियम महज़ कागज़ों में सीमित रह गया? क्यों लोक अदालतें सिर्फ़ औपचारिकता निभाने का साधन बनकर रह गईं? आखिर क्यों छोटी-छोटी बातें भी अदालतों की तारीख़ों में उलझकर सालों तक लंबित रह जाती हैं?

समाधान की दिशा

ग्राम न्यायालयों को सक्रिय करना : गांवों में न्यायालय बनें और वे वास्तविक अर्थों में काम करें।

लोक अदालतों को धार देना : समझौते के मामलों को औपचारिकता नहीं, बल्कि न्यायिक सख्ती से निपटाया जाए।

पंचायतों को आंशिक न्यायिक अधिकार : छोटे विवाद पंचायत स्तर पर ही निपटें, ताकि अदालतें राहत पा सकें।

डिजिटल न्याय प्रणाली : हर ग्राम पंचायत को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा मिले, जिससे ग्रामीण अपने गांव से ही सुनवाई में शामिल हो सकें।

कानूनी साक्षरता अभियान : ग्रामीणों को यह बताया जाए कि उनके लिए कौन से त्वरित न्याय विकल्प मौजूद हैं।

संपादकीय सवाल

अगर न्याय गांव की चौखट पर नहीं मिलेगा, तो लोकतंत्र का आधार कैसे मजबूत होगा? जब जनता अदालत के दरवाज़े पर वर्षों खड़ी रहे और न्याय सिर्फ़ तारीखों के बोझ तले दब जाए, तो क्या यह न्याय कहलाएगा या मज़ाक? सरकार और न्यायपालिका को यह समझना होगा कि न्याय केवल अमीर और शहरों के लोगों के लिए नहीं, बल्कि गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।

आज ज़रूरत है कि न्यायालयों की जमी धूल झाड़ी जाए, ग्रामीण न्याय व्यवस्था को जीवित किया जाए और “त्वरित न्याय” सिर्फ़ नारे में नहीं, बल्कि हकीकत में बदला जाए।

प्रताप नारायण बेहरा
सचिव
पत्रकार महासंघ छत्तीसगढ़

Back to top button