छत्तीसगढ़तमनाररायगढ़

राजस्व ज़मीन से लकड़ी की खुली लूट! तमनार लकड़ी तस्करी कांड में ओ कौन है जो तस्करो को दे रहा है संरक्षण

WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.05
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.06 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.06
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.16
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.07
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.08
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.07 (1)

राजस्व ज़मीन से लकड़ी की खुली लूट! तमनार तस्करी कांड में तहसील–पटवारी की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.15
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.14 (2)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.14
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.15 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.14 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.13
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.12

रायगढ़।
तमनार वन परिक्षेत्र में सामने आया “पुष्पा स्टाइल” लकड़ी तस्करी का मामला अब महज़ वन अपराध नहीं रह गया है। यह प्रकरण सीधे-सीधे राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली और नीयत पर सवाल खड़े करता है। जिस स्थान से खैर समेत बहुमूल्य लकड़ियों की कटाई और तस्करी हुई, वह राजस्व भूमि बताई जा रही है—और यहीं से पूरे सिस्टम की पोल खुलती नजर आ रही है।

WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.11 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.09 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.11
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.10
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.12 (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.09
WhatsApp Image 2026-01-25 at 14.40.08 (1)

राजस्व भूमि पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, लट्ठों का भंडारण और फिर ट्रक में लोड कर रायपुर तक भेजने की तैयारी—यह सब बिना किसी प्रशासनिक जानकारी के हो जाए, यह मानना कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि तहसीलदार और क्षेत्रीय पटवारी आखिर क्या कर रहे थे?

कागजों में सेमल, ज़मीन पर खैर

वन विभाग की प्रारंभिक जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि दस्तावेज़ों में सेमल जैसी सामान्य लकड़ी दिखाई गई, जबकि मौके पर खैर और अन्य कीमती प्रजातियों के ठूंठ और कटे लट्ठे पाए गए। यह सीधा संकेत है कि तस्करी योजनाबद्ध थी और जानबूझकर रिकॉर्ड में गुमराह किया गया।

यह खेल एक-दो दिन में नहीं खेला गया। महीनों से, शायद वर्षों से, यह अवैध कटाई चल रही थी। फिर सवाल यह भी है कि राजस्व रिकॉर्ड, निरीक्षण और रिपोर्टिंग की पूरी व्यवस्था आखिर किस लिए होती है?

राजस्व अमला मौन क्यों?

राजस्व भूमि पर किसी भी प्रकार की गतिविधि—चाहे वह कटाई हो, खुदाई हो या परिवहन—पटवारी के नक्शे और तहसील कार्यालय के संज्ञान में होती है। ऐसे में यह चुप्पी संदेह को और गहरा करती है।

क्या पटवारी ने जानबूझकर आंखें मूंदे रखीं?

क्या तहसील स्तर पर मिलीभगत के चलते कोई कार्रवाई नहीं हुई?

या फिर अवैध कमाई की हिस्सेदारी ने पूरे तंत्र को मौन रहने पर मजबूर कर दिया?

इन सवालों के जवाब सिर्फ जांच से नहीं, ईमानदार कार्रवाई से मिलेंगे।

एनओसी की आड़ में बड़ा खेल

मामले में पंचायत स्तर से जारी एनओसी भी अब शक के घेरे में है। राजस्व भूमि पर लकड़ी परिवहन के लिए किस अधिकार से एनओसी जारी की गई, और क्या इसके लिए तहसील से अनुमति ली गई—यह बिंदु बेहद गंभीर है। यदि एनओसी नियमों के विरुद्ध जारी हुई है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम के दुरुपयोग का मामला बनता है।

सिर्फ तस्कर नहीं, जिम्मेदार भी कटघरे में

अब तक की कार्रवाई में वाहन जब्ती और फरार आरोपी की तलाश तक मामला सीमित दिखाई दे रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि—
क्या जांच की सुई सिर्फ तस्करों पर रुकेगी, या राजस्व और वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों तक भी पहुँचेगी?

अगर राजस्व अमले की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि छोटे मोहरों पर कार्रवाई कर बड़े चेहरों को बचाया जा रहा है।

जंगल नहीं, व्यवस्था लुटी है

तमनार का यह मामला जंगल की कटाई से कहीं बड़ा है। यह प्रशासनिक विफलता, संभावित सांठगांठ और जवाबदेही के अभाव की तस्वीर पेश करता है। आज अगर राजस्व भूमि पर लकड़ी तस्करी हो सकती है, तो कल वही जमीन खनन और कब्ज़े का अड्डा बन सकती है।

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है—
या फिर यह भी उन मामलों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहाँ जंगल कट गए, फाइलें भर गईं और सवाल पूछने वाले खामोश कर दिए गए।

Back to top button