
प्रशासन की प्रशंसा या छात्रों के साथ अन्याय?
मास्टर ट्रेनर को गणतंत्र दिवस पर सम्मान, स्कूल में पढ़ाई ठप!
विशेष गहन पुनरीक्षण जैसे महत्वपूर्ण शासकीय कार्य में मास्टर ट्रेनर की भूमिका निभाने वाले विकास रंजन सिन्हा को गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रशस्ति पत्र देकर जिला प्रशासन ने सम्मानित तो कर दिया, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सम्मान उस क्षेत्र और उन छात्रों के साथ न्याय है, जहां वे मूल रूप से शिक्षक के रूप में पदस्थ हैं?
हम बात कर रहे हैं शासकीय माध्यमिक शाला सराईपाली की, जहां विकास रंजन सिन्हा वर्षों से शिक्षक के रूप में पदस्थ हैं। जमीनी हकीकत यह है कि वे महीने में महज 8 से 10 दिन ही स्कूल पहुंचते हैं, शेष दिनों में या तो शासकीय कार्यों के नाम पर या निजी कारणों से स्कूल से नदारद रहते हैं।
👉 नतीजा यह कि छात्र उनके विषयों की पढ़ाई ट्यूशन के भरोसे या स्वयं अध्ययन कर करने को मजबूर हैं।
👉 नियमित कक्षाएं नहीं, पाठ्यक्रम अधूरा, और परीक्षा का दबाव सीधे छात्रों पर।
अब सवाल उठता है—
क्या विशेष कार्यों में सक्रियता ही एक शिक्षक की पूरी जिम्मेदारी होती है?
क्या बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना शिक्षक का पहला दायित्व नहीं?
क्या ऐसे शिक्षक को सम्मानित करना उन छात्रों के जख्मों पर नमक नहीं?
प्रशासन द्वारा दिया गया प्रशस्ति पत्र भले ही कागजों में उपलब्धि दिखाए, लेकिन सराईपाली स्कूल के छात्र आज भी अपने शिक्षक की राह ताकते हैं। सम्मान पाने वाले शिक्षक के लिए यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए कि उन्होंने छात्रों के भविष्य के साथ कितना न्याय किया।
अब यह सिर्फ एक शिक्षक का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और जवाबदेही पर सीधा सवाल है।
❓ क्या शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रमाण पत्र हो गए हैं?
❓ क्या बच्चों का भविष्य सिर्फ फाइलों और मंचों तक सीमित रह गया है?
प्रशासन को चाहिए कि वह सम्मान देने से पहले जमीनी रिपोर्ट देखे, और यह सुनिश्चित करे कि पुरस्कार किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके कार्य की सच्ची ईमानदारी को मिले।
वरना ऐसे सम्मान… शिक्षा व्यवस्था पर एक कड़ा तमाचा बनकर रह जाएंगे।