
कला, कर्तव्य और सम्मान का अनूठा संगम : IPS शशि मोहन सिंह
कलाकार की संवेदना और एक सख्त पुलिस अधिकारी के जुनून का अद्भुत मेल देखना हो, तो आईपीएस शशि मोहन सिंह का नाम प्रमुखता से सामने आता है। रील लाइफ में अपनी अदाकारी का जलवा बिखेरने वाले और रियल लाइफ में अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह को स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रपति पुलिस पदक’ से सम्मानित किया जाना निश्चित रूप से गौरव का विषय है। यह सम्मान उनके कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी होने के साथ-साथ उनकी बहुआयामी प्रतिभा को भी रेखांकित करता है।
शशि मोहन सिंह का व्यक्तित्व इस मायने में खास है कि उन्होंने वर्दी के दायित्व और कला के मंच—दोनों को समान समर्पण के साथ साधा है। थियेटर के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी फिल्मों में अपनी पहचान बनाने वाले इस अधिकारी ने कला को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक जागरूकता का प्रभावी हथियार भी बनाया।
साइबर अपराध के बढ़ते खतरे के प्रति समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से “खौफ : द डिजिटल वार” जैसी शॉर्ट फिल्म का निर्देशन करना और उसमें मुख्य भूमिका निभाना उनकी इसी सोच का उदाहरण है। एक पुलिस अधिकारी द्वारा अपने रचनात्मक कौशल का उपयोग जनजागरूकता के लिए किया जाना निश्चित रूप से अनुकरणीय पहल है।
वहीं, पुलिस कप्तान के रूप में उनकी कार्यशैली में दृढ़ता और परिणाम देने का स्पष्ट नजरिया दिखाई देता है। जिले में कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने तथा अपराधियों और असामाजिक तत्वों पर प्रभावी कार्रवाई के लिए विभिन्न अभियानों के माध्यम से उन्होंने पुलिसिंग को एक सक्रिय और अभियानात्मक स्वरूप दिया। ऑपरेशन शंखनाद और आघात के जरिए अपराधी नेटवर्क पर कार्रवाई, ऑपरेशन अंकुश और प्रहार के माध्यम से असामाजिक तत्वों तथा अवैध गतिविधियों पर शिकंजा और ऑपरेशन क्लीन हंट एवं तलाश के जरिए संगठित अपराध तथा फरार अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई—ये अभियान उनकी सख्त कार्यशैली को दर्शाते हैं।
लेकिन एक पुलिस अधिकारी की सफलता केवल अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में नहीं, बल्कि समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों के साथ उसकी संवेदनशीलता में भी निहित होती है। इसी दृष्टि से ऑपरेशन मुस्कान जैसी पहल विशेष महत्व रखती है, जिसके माध्यम से गुमशुदा बच्चों और व्यक्तियों को उनके परिजनों तक पहुंचाने का मानवीय प्रयास किया गया। किसी परिवार के बिछड़े सदस्य को वापस मिलाना पुलिस की उस भूमिका को सामने लाता है, जिसमें वर्दी केवल कानून का प्रतीक नहीं, बल्कि भरोसे और संवेदना का भी प्रतीक बन जाती है।
शशि मोहन सिंह की यही दोहरी पहचान उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करती है—एक ओर कला के प्रति संवेदनशील कलाकार, तो दूसरी ओर अपराध के खिलाफ दृढ़ और अनुशासित पुलिस अधिकारी। मंच पर अभिनय की अभिव्यक्ति और मैदान में कानून के प्रति प्रतिबद्धता, दोनों का यह संगम वास्तव में दुर्लभ है।
राष्ट्रपति पुलिस पदक केवल एक व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि यह उस समर्पण, अनुशासन और कर्तव्यपरायणता की सार्वजनिक स्वीकृति है, जिसे एक पुलिस अधिकारी वर्षों की सेवा में अर्जित करता है। स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर यह सम्मान मिलना इसकी गरिमा को और बढ़ा देता है।
कला, कर्तव्य और सम्मान का यह अनूठा संगम निश्चित रूप से नई पीढ़ी के अधिकारियों के लिए प्रेरणा है। आईपीएस शशि मोहन सिंह को राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किए जाने पर पुलिस विभाग, कला जगत और समूचे प्रदेश की ओर से हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएं। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी संवेदनशीलता, रचनात्मकता और कर्तव्य के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता समाज और राष्ट्र की सेवा में इसी तरह नए आयाम स्थापित करती रहेगी।