
डिजिटल हाजिरी: जब तकनीक सुविधा नहीं, गले की फांस बन जाए
स्वास्थ्य सेवाओं में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से किया जा रहा है। लेकिन जब यही तकनीक वास्तविक परिस्थितियों को दर्ज करने में असफल हो जाए और उसकी गलती का खामियाजा कर्मचारी को भुगतना पड़े, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
रायगढ़ जिले में स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए लागू डिजिटल हाजिरी व्यवस्था इसी तरह के सवालों के घेरे में है। जियो-टैग और फेस स्कैन के माध्यम से हाजिरी दर्ज करने की व्यवस्था में कर्मचारी को निर्धारित स्वास्थ्य संस्थान के आसपास सीमित दायरे में रहकर उपस्थिति दर्ज करनी होती है। कर्मचारी अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर अपनी ड्यूटी करता है, मरीजों को सेवाएं देता है और हाजिरी दर्ज करने का प्रयास भी करता है। लेकिन नेटवर्क की समस्या, सर्वर की गड़बड़ी, जियो-लोकेशन की त्रुटि या एप्लीकेशन की तकनीकी समस्या के कारण यदि डिजिटल रिकॉर्ड में उसकी उपस्थिति दर्ज नहीं होती, तो बाद में उसे अनुपस्थित मानकर सीएल की मांग करना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
सबसे पहला सवाल यही है—क्या डिजिटल रिकॉर्ड में उपस्थिति दर्ज नहीं होना अपने आप में यह साबित करता है कि कर्मचारी ड्यूटी पर मौजूद नहीं था?
यदि कोई कर्मचारी उस दिन अस्पताल में मौजूद था, मरीजों का उपचार किया, अपनी शिफ्ट पूरी की और उसके सहकर्मी तथा अधिकारी उसकी उपस्थिति की पुष्टि कर सकते हैं, तो केवल डिजिटल सिस्टम में रिकॉर्ड नहीं बनने के आधार पर उसे अनुपस्थित मानना कितना व्यवहारिक है? तकनीक मनुष्य के काम को आसान बनाने के लिए है, मनुष्य को तकनीकी त्रुटि का दोषी बनाने के लिए नहीं।
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को सामान्य सरकारी कार्यालयों के साथ एक ही पैमाने पर देखना भी उचित नहीं होगा। अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों में सेवाएं कई स्थानों पर चौबीस घंटे संचालित होती हैं। कर्मचारी शिफ्ट में काम करते हैं। किसी की ड्यूटी सुबह हो सकती है, किसी की शाम और किसी की रात में। ऐसे में यदि डिजिटल हाजिरी की संरचना मुख्य रूप से सामान्य कार्यालयीन समय के अनुरूप है, तो शिफ्ट आधारित स्वास्थ्य सेवाओं के साथ उसका समन्वय स्वयं में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न है।
यहां समस्या डिजिटल हाजिरी के विरोध की नहीं है। समस्या गलत तरीके से डिजिटल हाजिरी को अंतिम सत्य मान लेने की है।
डिजिटल व्यवस्था निश्चित रूप से जरूरी है। इससे पारदर्शिता बढ़ सकती है और वास्तविक अनुपस्थिति पर नियंत्रण भी संभव है। लेकिन किसी तकनीकी प्रणाली की विश्वसनीयता तभी सार्थक होगी, जब उसमें तकनीकी विफलता के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था हो। नेटवर्क फेल होने, सर्वर डाउन होने, जियो-टैग गलत पकड़ने या फेस स्कैन में समस्या आने की स्थिति में वैकल्पिक उपस्थिति सत्यापन की व्यवस्था क्यों न हो?
ड्यूटी रोस्टर, मैनुअल उपस्थिति रजिस्टर, वरिष्ठ अधिकारी का प्रमाणन, मरीजों से संबंधित रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध सरकारी अभिलेखों को भी सत्यापन का हिस्सा बनाया जा सकता है। इससे वास्तविक रूप से अनुपस्थित कर्मचारी और तकनीकी कारणों से अनुपस्थित दिखाई देने वाले कर्मचारी के बीच अंतर किया जा सकेगा।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि कर्मचारी अपनी समस्या खुलकर सामने रखने में भी संकोच कर रहे हैं। यदि तकनीकी व्यवस्था को लेकर वास्तविक कठिनाइयां हैं, तो उनका समाधान संवाद के माध्यम से होना चाहिए। कर्मचारियों की चुप्पी को व्यवस्था की सफलता नहीं माना जाना चाहिए।
प्रशासन के सामने चुनौती यह नहीं है कि वह डिजिटल हाजिरी लागू करे या नहीं। चुनौती यह है कि डिजिटल व्यवस्था को मानवीय और व्यावहारिक कैसे बनाया जाए।
किसी भी व्यवस्था की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि उसका डेटा कितना अधिक है, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह जमीन पर वास्तविकता को कितनी सटीकता से प्रतिबिंबित करती है।
स्वास्थ्य कर्मचारी यदि अस्पताल में मौजूद होकर मरीजों की सेवा कर रहा है, तो तकनीकी खामी के कारण उसका पूरा दिन अवकाश में बदल देना न्यायसंगत प्रक्रिया नहीं हो सकती। पहले वास्तविक स्थिति का सत्यापन होना चाहिए, उसके बाद ही किसी कर्मचारी की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
डिजिटल हाजिरी पारदर्शिता का माध्यम बने, भय का कारण नहीं। तकनीक जवाबदेही सुनिश्चित करे, लेकिन तकनीकी त्रुटि की सजा कर्मचारी को न मिले—यही एक संवेदनशील और व्यावहारिक प्रशासन की पहचान होनी चाहिए।