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गौ वंश की दुर्दशा :- राजनीति की भेंट चढ़ती ‘ गौ माता ‘

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गौवंश की दुर्दशा : आस्था बनाम हकीकत

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छत्तीसगढ़ ही नहीं अपितु पूरे देश में गाय को मां का दर्जा दिया जाता है। मंदिरों में पूजा, त्यौहारों पर विशेष अनुष्ठान और मंचों पर नेताओं के भाषण—हर जगह गाय को आदर मिलता है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज रायगढ़ बिलासपुर कोरबा से लेकर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों तक गौवंश की स्थिति बेहद दयनीय है। कहीं सड़क पर खून से लथपथ तड़पती गाय दिखती है, तो कहीं भूख से बिलखते बछड़े दम तोड़ते हैं। धर्म और आस्था के नाम पर राजनीति खूब होती है, लेकिन धरातल पर गाय का संरक्षण शून्य है। सवाल उठता है कि क्या हमारी आस्था केवल नारों और भाषणों तक ही सीमित रह गई है?

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सड़क पर मौत आखिर कब तक

रायगढ़ कोरबा बिलासपुर हो नहीं प्रदेश के हर जिले की सड़कों पर हर दिन का दृश्य बन चुका है – आवारा घूमते गौवंश और तेज रफ्तार वाहनों से उनकी दर्दनाक मौत। ट्रक और हाइवा की टक्कर से गिरी गाय घंटों तड़पती रहती है और आखिर दम तोड़ देती है। न तो प्रशासन को फर्क पड़ता है, न ही जिम्मेदार विभागों को। यह केवल पशु का ही नहीं, मानवता का भी अपमान है। यही बेसहारा मवेशी कई बार सड़क दुर्घटनाओं की वजह बनकर इंसानी जान भी ले लेते हैं।

भूख से तड़पती “गौ माता”

सरकार की योजनाओं और घोषणाओं में करोड़ों रुपये गौशालाओं के लिए जारी होते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकतर गौशालाएं केवल कागजों पर चल रही हैं। जिनमें कुछ चालू भी हैं, वहां चारा और पानी का भारी अभाव है। गायें भूख से मर रही हैं, तो कई कचरे के ढेर से प्लास्टिक खाकर बीमार हो रही हैं। यही वो “गौ माता” है, जिसके नाम पर नेता राजनीति की रोटियां सेंकते हैं।

राजनीति का सबसे बड़ा हथियार

चुनाव आते ही “गाय” सबसे बड़ा मुद्दा बन जाती है। एक ओर धर्म और संस्कृति का हवाला दिया जाता है, दूसरी ओर वादों की लंबी सूची सुनाई जाती है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं। गाय की सुध लेने वाला कोई नहीं। सच्चाई यह है कि गौवंश हमारे नेताओं के लिए केवल वोट बैंक का साधन है, संवेदनशीलता या संरक्षण का विषय नहीं।

आखिर समाधान कब?

गौवंश की सुरक्षा केवल भावनाओं की बात नहीं है, यह सामाजिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है। अब समय आ गया है कि सरकार और समाज मिलकर ठोस कदम उठाएं।

पारदर्शिता जरूरी है – गौशालाओं के लिए जो बजट जारी होता है, उसकी सख्त निगरानी हो। हर रुपया धरातल पर खर्च हो, न कि नेताओं और अफसरों की जेब में जाए।

सड़क सुरक्षा और आश्रय गृह – आवारा मवेशियों को व्यवस्थित आश्रय गृह में भेजने की कार्ययोजना बने। सड़क दुर्घटनाओं से बचाने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई हो।

जन सहयोग से बदलाव – केवल सरकार ही नहीं, समाज को भी आगे आना होगा। चारे, पानी और दान की जिम्मेदारी लोग भी उठाएं।

राजनीति से बाहर निकलना होगा – गाय को केवल धार्मिक प्रतीक बनाकर इस्तेमाल करने की बजाय इसे व्यावहारिक नीति और संवेदनशीलता से जोड़ना होगा।

निष्कर्ष

गाय के नाम पर वोट मांगने वाले नेताओं और धार्मिक भाषण देने वालों से अब सवाल करना चाहिए कि आखिर हमारी “गौ माता” सड़कों पर क्यों मर रही हैं? कब तक राजनीति के नाम पर आस्था का मज़ाक बनता रहेगा? यह स्थिति केवल रायगढ़ या छत्तीसगढ़ की नहीं, बल्कि पूरे देश का आईना है। अगर अब भी संवेदनशील कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें यही कहेंगी कि हमने आस्था के नाम पर राजनीति तो खूब की, लेकिन गायों को मरने के लिए छोड़ दिया।

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