
जानकारी देने से बच रहे अधिकारी कहीं रामानुजगंज की झलक रायगढ़ में तो नहीं
सूचना के अधिकार पर ‘ताला’? खादी ग्रामोद्योग रायगढ़ में आवेदन के बाद भी जानकारी अटकी, अधिकारी नदारद
रायगढ़ – पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बना सूचना का अधिकार (RTI) कानून क्या महज कागजी साबित हो रहा है? ऐसा ही सवाल खड़ा हो रहा है रायगढ़ के खादी ग्रामोद्योग कार्यालय में, जहां 6 जनवरी 2026 को दिए गए एक आरटीआई आवेदन पर अब तक पूर्ण जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी के संबंध में विभाग की ओर से 3 फरवरी 2026 को पत्र जारी कर जानकारी प्रदान करने की बात कही गई, लेकिन हकीकत यह है कि आवेदक पिछले दो दिनों से कार्यालय के चक्कर काट रहा है और संबंधित अधिकारी कार्यालय से नदारद बताए जा रहे हैं।
“दस्तावेज प्रभार में नहीं मिले” – जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश?
फोन पर संपर्क करने पर संबंधित अधिकारी का जवाब और भी चौंकाने वाला है। उनका कहना है कि तत्कालीन अधिकारी ने उन्हें उक्त दस्तावेज प्रभार में सौंपे ही नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विभागीय अभिलेखों का संधारण इतना लापरवाह तरीके से किया जा रहा है, या फिर किसी संवेदनशील जानकारी को दबाने का प्रयास हो रहा है?
यदि दस्तावेज प्रभार में नहीं दिए गए, तो क्या प्रभार हस्तांतरण की विधिवत प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ? और यदि हुआ, तो रिकॉर्ड कहां है? यह स्थिति खुद विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही है।
30 दिन की समय-सीमा का क्या हुआ?
सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत किसी भी लोक सूचना अधिकारी को 30 दिनों के भीतर जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य है। 6 जनवरी को दिए गए आवेदन पर 3 फरवरी को पत्र जारी करना तो समय-सीमा के भीतर माना जा सकता है, लेकिन वास्तविक रूप से जानकारी उपलब्ध न कराना अधिनियम की भावना के विपरीत है।
यदि आवेदक को बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ें और अधिकारी उपलब्ध ही न हों, तो यह पारदर्शिता नहीं, बल्कि टालमटोल की रणनीति प्रतीत होती है।
रामानुजगंज प्रकरण की छाया?
हाल के दिनों में रामानुजगंज क्षेत्र में खादी ग्रामोद्योग से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले सुर्खियों में रहे हैं। ऐसे में रायगढ़ कार्यालय की सुस्ती और दस्तावेजों को लेकर अस्पष्टता कहीं उसी तरह की अनियमितताओं की झलक तो नहीं? क्योंकि रायगढ़ में तत्कालीन अधिकारी पदस्थ थे वहीं इस भ्रष्टाचार के मामले निलंबित किए गए है सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार कोरबा शक्ति जिलों में भी वित्तीय अनियमितता बताई जा रही है परन्तु जब रामानुजगंज में सत्तर लाख की प्राइवेट संस्थान की भुगतान पर महज निलंबन की कार्यवाही कर पर्दा डालने का काम क्या गया है जबकि उक्त मामले पर एफ आई आर होनी चाहिए थी पर हुई नहीं जिससे चर्चा आम है कि क्या रायगढ़ में जानकारी देने से बचना बड़ा सवाल खड़ा करता है
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि मांगी गई जानकारी में वित्तीय लेन-देन, योजनाओं के क्रियान्वयन या लाभार्थियों से जुड़ा कोई संवेदनशील विषय हो सकता है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभाग की कार्यशैली संदेह को जन्म दे रही है।
जवाबदेही तय होगी या मामला दबेगा?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर जांच कराएगा? यदि दस्तावेज वास्तव में प्रभार में नहीं दिए गए, तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। और यदि जानकारी जानबूझकर रोकी जा रही है, तो यह सूचना अधिकार कानून का खुला उल्लंघन है, जिस पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी है।
पारदर्शिता का दावा करने वाली व्यवस्था में यदि सूचना पाने के लिए आम नागरिक को दर-दर भटकना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंताजनक संकेत है।
अब निगाहें जिला प्रशासन और खादी ग्रामोद्योग के उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं—क्या वे इस मामले में स्पष्टता लाकर जनता का भरोसा कायम करेंगे, या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा?