
जनपद पंचायत घरघोड़ा में कथित तौर पर राजमिस्त्री प्रशिक्षण के नाम पर हुए लगभग 26 लाख रुपये के घोटाले ने पंचायत व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों में जो तथ्य सामने आए हैं, वे यह संकेत देते हैं कि शासन की महत्वाकांक्षी योजनाओं को जमीनी स्तर पर किस तरह कागजों में सीमित कर सरकारी राशि का बंदरबांट किया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2023-24 एवं 2024- 25 में विभिन्न ग्राम पंचायतों में ग्रामीणों को रोजगार और निर्माण कार्यों में दक्ष बनाने के उद्देश्य से राजमिस्त्री प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए शासन द्वारा लगभग 26 लाख रुपये की राशि आबंटित की गई थी। यह राशि जनपद पंचायत घरघोड़ा के आवास शाखा को प्राप्त हुई, जहां इस योजना के संचालन की जिम्मेदारी आवास


समन्वयक लम्बोदर चंद्रा के पास थी।
लेकिन अब आरोप लग रहे हैं कि प्रशिक्षण सिर्फ कागजों में आयोजित किया गया। फर्जी मस्टररोल, संदिग्ध उपस्थिति पंजी और कागजी दस्तावेजों के सहारे पूरे प्रशिक्षण कार्यक्रम का रिकॉर्ड तैयार कर राशि फर्जी हितग्राहियों के नाम जमा कर आहरित कर ली गई। ग्रामीणों का कहना है कि जिन गांवों में प्रशिक्षण दिखाया गया, वहां न तो कोई वास्तविक प्रशिक्षण शिविर लगा और न ही लोगों को इसकी जानकारी मिली। कई पंचायतों में ऐसे लोगों के नाम दर्ज पाए गए जो या तो प्रशिक्षण में शामिल ही नहीं हुए या फिर उन्हें इसकी भनक तक नहीं थी।
सूत्रों के अनुसार इस पूरे मामले में मस्टररोल तैयार करने से लेकर भुगतान प्रक्रिया तक सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से किया गया। आरोप है कि कागजों में मजदूर, प्रशिक्षक और हितग्राहियों की संख्या बढ़ाकर लाखों रुपये का भुगतान निकाल लिया गया। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि प्रशिक्षण वास्तव में हुआ था तो उसके फोटो, वीडियो, उपस्थिति प्रमाण और लाभार्थियों का भौतिक सत्यापन कहां है?
सबसे बड़ा सवाल ऑडिट व्यवस्था को लेकर खड़ा हो रहा है। आखिर जब हर योजना का नियमित ऑडिट होता है तो इतने बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा अब तक क्यों नहीं हुआ? क्या ऑडिट सिर्फ फाइलों की खानापूर्ति बनकर रह गया है? या फिर सिस्टम के भीतर बैठे जिम्मेदार लोगों की मिलीभगत से पूरे मामले को दबाया जाता रहा?
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पंचायत स्तर पर लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां योजनाओं का लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक पहुंचने के बजाय कागजों में खर्च दिखाकर राशि निकाल ली जाती है। यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई और चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।
अब मांग उठने लगी है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, फर्जी मस्टररोल और भुगतान दस्तावेजों की जांच हो तथा दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जाए। क्योंकि यदि रोजगार और कौशल विकास जैसी योजनाएं भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने लगें, तो यह सिर्फ सरकारी धन की लूट नहीं बल्कि गरीबों के अधिकारों पर सीधा हमला है।
बहरहाल अब देखना होगा कि अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद कार्यवाही होती है या भ्रष्ट सिस्टम का ये भी हिस्सा बन जाते हैं