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झिकाबहाल हादसा: आखिर कब जागेगा प्रशासन?

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झिकाबहाल हादसा: आखिर कब जागेगा

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प्रशासन?
रायगढ़ जिले के तमनार थाना क्षेत्र अंतर्गत झिकाबहाल में मंगलवार शाम हुआ भीषण सड़क हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और व्यवस्था की विफलता का ज्वलंत उदाहरण है। दो ट्रेलरों की आमने-सामने टक्कर के बाद लगी आग में एक चालक की दर्दनाक मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब जनता जानना चाहती है।
तमनार क्षेत्र की सड़कें आज भारी वाहनों के दबाव से कराह रही हैं। कोयला, राख और औद्योगिक परिवहन से दिन-रात दौड़ते ट्रेलरों ने आम लोगों का जीवन जोखिम में डाल दिया है। इसके बावजूद न तो यातायात नियंत्रण की कोई प्रभावी व्यवस्था दिखाई देती है और न ही ओवरलोडिंग तथा तेज रफ्तार वाहनों पर कोई ठोस कार्रवाई।
सवाल यह है कि आखिर हर बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन की नींद क्यों खुलती है? जब सड़कें मौत का रास्ता बन चुकी हैं, तब भी जिम्मेदार विभाग केवल कागजी समीक्षा और बैठकों तक सीमित क्यों हैं? क्या किसी निर्दोष की जान चली जाने के बाद ही सुरक्षा उपायों की याद आती है?
झिकाबहाल की घटना ने यह साबित कर दिया है कि उद्योगों की चकाचौंध में मानव जीवन की कीमत लगातार कम होती जा रही है। जिन सड़कों पर प्रतिदिन हजारों भारी वाहन गुजरते हैं, वहां पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम, नियमित निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र का अभाव आखिर किसकी जिम्मेदारी है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में बेलगाम रफ्तार से दौड़ रहे भारी वाहनों पर नियंत्रण के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है। यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई की गई होती, तो शायद आज एक परिवार अपने सदस्य को इस दर्दनाक तरीके से न खोता।
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या यह हादसा भी अन्य घटनाओं की तरह कुछ दिनों की चर्चा बनकर फाइलों में दब जाएगा, या फिर वास्तव में ऐसी व्यवस्था बनाई जाएगी जिससे भविष्य में किसी चालक, मजदूर या आम नागरिक को अपनी जान की कीमत न चुकानी पड़े।
झिकाबहाल का काला धुआं केवल जले हुए ट्रेलरों का धुआं नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था पर उठता हुआ सवाल था जो हादसों के बाद सक्रिय होती है और फिर समय के साथ सब कुछ भूल जाती है।

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