
जैविक खेती को बढ़ावा देने की योजना पर कृषि विभाग की लापरवाही भारी, ढेंचा एवं मूंग का अनुदानित बीज किसानों तक नहीं पहुंचा
50 प्रतिशत अनुदान पर मिला था बीज का आबंटन, समय पर वितरण नहीं होने से किसान रहे वंचित, जैविक खेती को लगा झटका
घरघोड़ा।
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ढेंचा एवं मूंग के बीज 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई थी। इसके तहत कृषि विभाग को बीजों का आबंटन भी प्राप्त हो गया था, लेकिन कृषि विभाग घरघोड़ा की लापरवाही और उदासीनता के कारण इन बीजों का समय पर वितरण नहीं हो सका। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में किसान इस योजना का लाभ लेने से वंचित रह गए।
जानकारी के अनुसार, ढेंचा और मूंग जैसी हरित खाद वाली फसलें खरीफ सीजन की मुख्य फसल की बुवाई से पहले बोई जाती हैं। कुछ समय बाद इन्हें खेत में जुताई कर मिला दिया जाता है, जिससे मिट्टी में प्राकृतिक रूप से जैविक तत्व और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। इससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और किसानों की लागत में भी कमी आती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इन फसलों की बुवाई का एक निश्चित समय होता है। समय निकल जाने के बाद इनका उपयोग जैविक खाद के रूप में नहीं हो पाता। ऐसे में यदि बीज समय पर किसानों तक नहीं पहुंचे तो पूरी योजना का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि शासन की मंशा किसानों को जैविक खेती की ओर प्रेरित करने की है, लेकिन विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के कारण योजनाएं केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाती हैं। यदि बीजों का समय पर वितरण किया जाता तो किसान इसका लाभ उठाकर अपनी भूमि की उर्वरता बढ़ा सकते थे।
किसानों का आरोप है कि कृषि विभाग द्वारा न तो समय पर सूचना दी गई और न ही बीज वितरण की प्रभावी व्यवस्था बनाई गई। जब तक किसानों को जानकारी मिली, तब तक ढेंचा एवं मूंग की बुवाई का उपयुक्त समय निकल चुका था। इससे अनुदानित बीज का लाभ किसानों तक नहीं पहुंच सका।
यह मामला शासन की महत्वाकांक्षी जैविक खेती योजना के क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े करता है। एक ओर सरकार प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर अधिकारियों की कार्यशैली इन योजनाओं की सफलता में बाधा बन रही है।
अब किसानों ने मांग की है कि पूरे मामले की जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि बीज का आबंटन कब हुआ, वितरण क्यों नहीं हो सका और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाएगी। किसानों का कहना है कि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोबारा न हो, इसके लिए जवाबदेही तय करना आवश्यक है, ताकि शासन की योजनाओं का वास्तविक लाभ समय पर किसानों तक पहुंच सके।