छत्तीसगढ़तमनार

मुड़ागांव कोल माइंस: सौदेबाज़ी की जहर से आंदोलन की मौत?

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मुड़ागांव कोल माइंस: सौदेबाज़ी की जहर से आंदोलन की मौत?

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रायगढ़ ज़िले का मुड़ागांव… बरसों से कोल माइंस और पेड़ कटाई का गढ़ बना हुआ था महीनों तक सड़क पर आंदोलन, धरना-प्रदर्शन, नारेबाज़ी और गिरफ्तारी की कहानियाँ गूंजती रहीं। लेकिन अब वही मुड़ागांव अचानक “शांत” क्यों है?

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आज अडानी समूह ने धूमधाम से कोल माइंस हेतु भूमि पूजन कर दिया। वही अडानी, जिसके खिलाफ ग्रामीणों ने जंगल-जमीन बचाने की कसम खाई थी। वही अडानी, जिसके खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता और नेता छाती ठोककर खड़े रहे थे। वादों इरादों की झड़ी लगी रहती थी जान दे देगें लेकिन जमीन नहीं देंगे कहते थे लेकिन आज न कहीं झंडा दिखा, न नारे, न मंच, न विरोध—सब तरफ़ सन्नाटा।

यह सन्नाटा सवालों से भरा है। क्या जनता की लड़ाई, नेताओं के लिए सिर्फ मंच और प्रचार का साधन थी? जब तक सुर्खियाँ मिलती रहीं, सब मंच पर खड़े रहे, और आज जब असली परीक्षा आई, तब सबने मुंह फेर लिया।

जमीनी ग्रामीण जो नेतृत्व नहीं कर पाते खुद को धोखा खाया महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है—“नेता हमें आंदोलन की आग में झोंकते रहे, और अब नेता कंपनी के साथ ‘समझौता’ करते नजर आते हैं।” आखिर यह ग्रामीणों के विश्वास के साथ छलावा नहीं तो और क्या है

मुड़ागांव का सवाल अब सिर्फ जंगल और जमीन का नहीं रह गया है। यह सवाल है भरोसे का, सवाल है उस संघर्ष का जो जनता ने सालों तक किया।

👉 अगर यही राजनीति है—जहाँ नेता जनता के सपनों की सौदेबाज़ी करें—तो फिर ग्रामीणों के संघर्ष का भविष्य क्या होगा?
👉 क्या मुड़ागांव की खामोशी वाकई समझौते की कहानी कह रही है, जब जब ग्रामीणों की आवाज दबाया गया है तब तब मौन विद्रोह से ग्रामीणों ने तख्तों ताज बदल दिया है

अब देखना ये होगा कि नेतृत्व विहीन ग्रामीण अपने गांव की छवि पर लगे दाग धोने के लिए उग्र आंदोलन करते हैं या फिर मौन होकर मौके की तलाश करेंगे

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