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धनबल के आगे कानून बेबस! हमीरपुर बॉर्डर पर ट्रांसपोर्टरों की खूनी झड़प, पुलिस अब तक खाली हाथ

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धनबल के आगे कानून बेबस! हमीरपुर बॉर्डर पर ट्रांसपोर्टरों की खूनी झड़प, पुलिस अब तक खाली हाथ

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रायगढ़ (छत्तीसगढ़) और उड़ीसा के ट्रांसपोर्टरों के बीच हमीरपुर बॉर्डर पर हुए विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। मामूली कहासुनी से शुरू हुआ मामला देखते ही देखते मारपीट में बदल गया। घटना में कई लोग घायल हुए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि तमनार थाना में एफआईआर दर्ज होने के बावजूद अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से ट्रांसपोर्टिंग को लेकर तनातनी चल रही थी। हमीरपुर बॉर्डर पर आमने-सामने आने के बाद बात बिगड़ गई और हथियार लैस लाठी-डंडों से हमला किया गया। सड़क पर अफरा-तफरी मच गई, ट्रकों की लंबी कतार लग गई और आवागमन बाधित हो गया।

*हथियारों का बेखौफ़ खुला प्रदर्शन*

इस वारदात का सबसे गंभीर पहलू हथियारों का खुला और संगठित प्रदर्शन है, जहां 100 से अधिक लोगों की भीड़ तलवार, लाठी, हॉकी डंडे और ज्वलनशील पदार्थों के साथ एकजुट होकर पहुंची, जो इसे सामान्य विवाद से उठाकर संगठित अपराध की श्रेणी में ले जाता है। चिंताजनक पहलू यह है कि यह हमला किसी व्यक्तिगत विवाद पर नहीं बल्कि वैधानिक यूनियन गतिविधियों पर किया गया, जिससे श्रमिक संगठनों, व्यापारिक संस्थाओं और औद्योगिक शांति पर सीधा प्रहार हुआ है।

औद्योगिक जिला रायगढ़ में गैंग कल्चर की बढ़ती जड़ें

औद्योगिक गतिविधियों, ठेकेदारी व्यवस्था और श्रमिक संगठनों के इर्द-गिर्द धीरे-धीरे गैंग कल्चर अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है। दबदबा बनाने, वसूली और वर्चस्व की लड़ाई में हथियारों का इस्तेमाल अब अपवाद नहीं रह गया है। संगठित गिरोह स्थानीय विवादों को गैंगवार में बदलने की क्षमता हासिल कर चुके हैं। यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते रोक नहीं लगी तो रायगढ़ का सामाजिक संतुलन और औद्योगिक शांति गंभीर खतरे में पड़ सकती है।

पुलिस की कार्यशैली पर सवाल

घटना को कई दिन बीत जाने के बावजूद पुलिस की सुस्त कार्रवाई से आम जनता में आक्रोश है। लोगों का आरोप है कि आरोपी ट्रांसपोर्टरों के पास भारी धनबल और राजनीतिक पहुंच है, जिसके चलते पुलिस प्रशासन दबाव में नजर आ रहा है। एफआईआर दर्ज कर औपचारिकता निभा दी गई, लेकिन धरातल पर कार्रवाई शून्य है।

अब सवाल यह है—
क्या पुलिस धनबल के आगे यूं ही घुटने टेकती रहेगी?
या फिर कानून का राज कायम होगा?

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